अचानकमार से लाये गए हाथी अब तमोर पिंगला में जंजीरों में कैद

राकेश मित्तल

प्रतापपुर– सिविल बहादुर और सोनू…..अचानकमार अभ्यारण्य से तो आजाद हो गए लेकिन तमोरपिंगला के रेस्क्यू सेंटर में भी ये आजाद नहीं हैं और अधिकांश समय इन्हें जंजीरों में बांध कर कैद रखा जाता है।इनके लिए अब तक उचित चिकित्सीय व्यवस्था नहीं की गई है, घंटों उन्हें जंजीरों में बंधे होने के कारण अपने ही मलमूत्र में खड़े रहना पड़ता है,इनके साथ यहां हो रहा व्यवहार किसी प्रताड़ना से कम नहीं है।इन्हें तमोर पिंगला में रखा तो हाइकोर्ट के निर्देश पर है लेकिन अधिकारियों ने यहां भी न्यायालय के आदेश को ताक पर रख दिया है।
गौरतलब है कि अचनाकमार अभ्यारण्य में जंजीरों में बंधे सिविल बहादुर सहित अन्य हाथियों को आजाद करने के निर्देश के बाद  सिविल बहादुर और सोनू नाम के हाथियों को
तमोरपिंगला अभ्यारण्य में बनाये गए पुनर्वास केंद्र रेस्क्यू सेंटर में पिछले महीने पांच मई को लाया गया था ताकि यहां आजाद रहकर स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकें।वाईल्ड लाईफ सरगुजा के साथ वन विभाग के अधिकारियों ने यहां भी हाइकोर्ट के आदेश को ताक में रख दिया है तथा यहां भी इनकी स्थिति अचानकमार से कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है,हाथी वहां भी कैद थे और यहां भी।हाइकोर्ट में याचिका का मुख्य बिंदु हाथियों को जंजीर में बांध कर रखना था जिससे वे प्रताड़ित हो रहे थे तथा शरीर के कई हिस्सों में गहरे घाव हो गए थे अब ऐसा ही कुछ अधिकारियों के रैवैये के कारण यहां भी हो रहा है।मिली जानकारी के अनुसार रेस्क्यू सेंटर में भी दोनों हाथियों को कैद करके ही रखा है,ज्यादातर समय इन्हें जंजीर में बांध कर रखा जाता है,केवल कुछ समय के लिए इन्हें जंजीर से मुक्त किया जाता है जब महावत इन्हें रेस्क्यू सेंटर के अंदर घुमाते हैं तथा शाम होते ही जंजीरों में बांध दिया जाता है।बताया जा रहा है कि जंजीर बंधे होने के दौरान हाथी एक ही जगह पर खड़े या बैठे रहते हैं तथा आस पास स्वतन्त्र रूप से विचरण भी नहीं कर पाते।हाथी मलमूत्र वहीं पे करते हैं तथा मलमूत्र की गंदगी में ही उन्हें रहना पड़ता है जो उनमें कई बीमारियों का कारण बन सकते हैं,जंजीरों में बंधे होने के कारण इनमें फिर से घाव जैसे निशान होने लगे हैं।अचनाकमार में इनके साथ हो रही प्रताड़ना से से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से तमोर पिंगला में इन्हें भेजा गया है लेकिन यहां भी इनका जीवन नरकीय हो गया है तथा जंजीर में बांध कैद करने के साथ रेस्क्यू सेंटर की छोटी सी जगह में इनके लिए प्रताड़ना से कम नहीं है,यहां भी अधिकारियों ने सिविल बहादुर और सोनू की स्वतंत्रता छीन ली है।वाईल्ड लाईफ और वन विभाग  सरगुजा के अधिकारियों ने पूरे मामले में हाइकोर्ट के निर्देशों को भी ताक में रख दिया है,अचनाकमार में कैद हाथियों को स्वतन्त्र करने के आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए रेस्क्यू सेंटर में फिर से कैद कर दिया है जहाँ सिविल बहादुर और सोनू प्रताड़ना के साथ नरकीय जीवन जी रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सिविल बहादुर और सोनू को जब से यहां लाया गया है तभी से इन्हें जंजीरों में बांध प्रताड़ित किया जा रहा है,यहां लाने के बाद सीसीएफ केके विसेन व अन्य द्वारा की गई पूजा के दौरान भी हाथी जंजीरों में ही बंधे हुए थे।

पहले दो हिरन मरे,अब हाथी घायल लेकिन नहीं चिकित्सक की सुविधा

तमोर पिंगला अभ्यारण्य में बने डिअर पार्क में अधिकारियों की लापरवाही और उचित इलाज के अभाव में कुछ दिनों पूर्व दो हिरनों की मौत हो चुकी है तथा अब रेस्क्यू सेंटर में सिविल बहादुर गम्भीर रूप से चोटिल है लेकिन वाईल्ड लाईफ सरगुजा वन्य प्राणियों की सुरक्षा को ताक में रख इन्हें उचित इलाज मुहैया नहीं करा रहा है,अब तक वन्य प्राणियों के दृष्टिकोण से विशेषज्ञ चिकित्सक की नियुक्ति नहीं कर रहा है।सिविल बहादुर के टूटे हुए दांत के पास जबड़े और कान के बीच में कई दिनों से गहरा घाव है जिसे लेकर पहले तो यहां के अधिकारियों ने गम्भीरता नहीं दिखाई और जब बात बाहर फैलने लगी तो स्थानीय पशुचिकित्सक पांडे को बुलाकर इलाज के नाम पर औपचारिकता कर दी जबकि सिविल बहादुर को उच्च चिकित्सा की आवश्यकता है।

छोड़ना था जंगल में,कैद कर लिया रेस्क्यू सेंटर में

जंगली जानवर को बंधक बनाने के खिलाफ  प्रस्तुत जनहित याचिका में कोर्ट ने राज्य शासन व वन विभाग को हाथी का उपचार कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने व उसके पुनर्वास के लिए विशेषज्ञों की सेवा लेने का आदेश दिया था। आदेश पर राज्य शासन ने सोनू हाथी के उपचार के लिए केरल के डॉ. राजीव टीएस व उनकी टीम की सेवा ली थी जो कॉलेज ऑफ वेटनरी एंड एनीमल साइंस के सेंटर फॉर स्टडीज ऑन एलीफेंट में सहायक प्राध्यापक व प्रोजेक्टर लीडर हैं। उन्होंने सोनू हाथी की जांच व उपचार के बाद जून 2016 में फिर से जंगल में छोड़ने की अनुशंसा की थी,इसके बावजूद उस समय उसे नहीं छोड़ा गया था। मामले की हाईकोर्ट में पुनः सुनवाई हुई। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य शासन को सोनू हाथी को जंगल में छोड़ा जा सकता है या नहीं इस संबंध में विशेषज्ञों से जांच रिपोर्ट मांगी थी।दूसरी बार भी विशेषज्ञों ने सोनू को स्वस्थ्य होने और उसे जंगल में छोड़े जाने की बात कही थी।विशेषग्यों के राय के बाद कोर्ट ने हाथियों को स्वतन्त्र रूप से जंगल में छोड़ने की बात कही थी ताकि वे स्वतन्त्र रूप से अपना जीवन जी सकें लेकिन अधिकारियों ने जंगल में छोड़ने की बजाए रेस्क्यू सेंटर में कैद कर लिया है।

क्या कहा था कोर्ट के निर्देश पर बनी कमेटी ने

अचानकमार टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों द्वारा हाथियों को कई साल से जंजीरों से जकड़कर रखने के कारण उनके पैरों में घाव हो गए थे और उनमें से कई पैर से घसीटकर चल रहे थे। दायर याचिका के बाद हाथियों के हालात को जानने के लिए कोर्ट के निर्देश पर दो सदस्यीय कमेटी बनाई गई थी जिसके बाद केंद्रीय एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट में कहा था कि हाथी के घावों को कम से कम दो बार पानी से धोना चाहिए।  हाथी को कम से कम एक घंटा चलाया जाए।  हाथी के लिए टेम्पररी शेड का निर्माण किया जाए।  खून की जांच, किडनी का फंक्शन टेस्ट, लीवर फंक्शन टेस्ट, पेशाब की जांच हो।   घाव ठीक होने के बाद हाथी को निर्धारित प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाए।  राजू लाली और सिविल बहादुर की तुरंत चिकित्सीय जांच करवाने के बाद अनुभवी पशु चिकित्सक से जांच कराई जाए।  हाथी को खुद की पेशाब और मल में खड़े रहना पड़ता है, वहां सफाई जरूरी है। हाथी का वैक्सीनेशन नहीं किया जा रहा है, इससे वह बीमार हो सकता है।  जंग लगे बर्तन में पानी दिया जाता है,  साफ-सुथरे बर्तनों में पानी दिया जाए।कमेटी ने कोर्ट को दी रिपोर्ट में इन सावधानियों का उल्लेख किया था जो हाथियों के लिए अति आवश्यक हैं लेकिन रेस्क्यू सेंटर में अधिकारियों ने उनके लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कि है जो दोनों हाथियों के लिए खतरनाक हो सकते हैं।