लेमरू एलीफैंट रिज़र्व के विरोध में सरगुजा के प्रभावित ग्रामीणों की हुई बैठक…

राजेश सोनी

उदयपुर:- लेमरू एलिफैंट रिजर्व के विरोध में अब लोगों का विरोध खुल कर सामने आ रहा है । इसी कड़ी में इससे प्रभावित सरगुजा जिले के लखनपुर  तहसील के  जीवलिया  में बैठक किया गया , उक्त बैठक में उदयपुर तथा लखनपुर ब्लॉक के लोग शामिल हुए।  जिसमें लेमरू एलिफैंट रिज़र्व को ग्रामीणों ने  सुनियोजित लूट की शुरुआत बताया । दरअसल ये पूरा इलाका जंगलों से भरा-पूरा है , इन्हीं जंगलों के गर्भ में जहां एक ओर वनोपज का भंडार है वहीं दूसरी तरफ अकूत कोयले की सम्पदा है । ग्रामीणों ने इसे सुनियोजित कोयले की लूट की पटकथा कहा । ग्रामीण यह मानते हैं कि हाथियों और इंसानों का साथ रहना नामुमकिन है, तो इस तरह की परिस्थिति निर्मित की जा रही है जिससे इंसान यह जगह छोड़ दें बाद में कोयले की लूट में भागीदारों को विरोध का सामना न करना पड़े , लेकिन सीधे -सादे और मासूम गाँववाले अब जाग चुके हैं ।
मनबहार ने कहा कि यदि हम अपनी जगह छोड़ देंगे तो हम कहाँ जाएंगे । रोनहा मिंज ने बताया कि जंगल ही हमारी रोज़ी रोटी है , दादा पुरखे हमारे इसी जंगल से अपना जीवन -परिवार पालते आये थे , अब हम इसे छोड़ कर कहाँ जाएंगे , यहां से जो वनोपज मिलता है उसी से हम सब बच्चों के भविष्य के लिए सोच पाते हैं ।  सोमार साय ने कहा कि ये अफवाह फैलाई जा रही है कि हमारा पुनर्वास नहीं होगा और हमें जंगल छोड़ कर कहीं दूसरी जगह जाना नहीं होगा , जबकि वास्तविकता इससे अलग है ,  दूसरी जगहों पर जब पुनर्वास किया गया है तो उनका जंगल भी छीन गया , और ग्रामीण किसी काम के लायक भी नहीं रहे । सोमार साय जो कि स्थानीय स्तर पर बेहद सक्रीय हैं , ने कहा कि की सरगुजा बेहद संवेदनशील जगह है  हाथी उड़ीसा की तरफ से आकर लगातार  नुकसान पहुंचा रहे हैं , जानमाल का खतरा हमेशा बना रहता है , फिर उसी समस्या को बढ़ाकर हमारी जान जोखिम में डालने के का रहस्य समझ नहीं आ रहा है । 
समाजसेवी जावेद खान ने कहा कि यह बहुत मुश्किल है हाथियों के साथ सामंजस्य बनाकर जंगल में रह पाना , तो यदि यह एलीफैंट रिज़र्व अस्तित्व में आता है तो बेशक यह जंगल के निवासियों के साथ एक छलावा होगा । यह अटल सत्य है कि  जंगली हाथियों के साथ मनुष्य रह ही नहीं सकता यह हम बरसों से देखते आ रहे हैं , क्योंकि हर साल हाथियों के द्वारा बहुतेरे लोग मार दिए जाते हैं, फिर एक और बात है कि अभी की घोषणा पर ध्यान दिया जाए तो घासीदास टाईगर रिज़र्व घोषित किया गया है  , फिर हाथी और शेर को  एक ही जगह क्यों न बसाया1 जाए , ताकि आगे जन धन की और हानि न हो। जानबूझकर एक डरावनी तस्वीर बनाई जा रही है , शेर के लिए अलग रिज़र्व , हाथी के लिए अलग , फिर आगे बंदरों , बिल्लियों के लिए भी , बस इंसानों के लिए बदनसीबी ये है कि आज के दौर में इंसान होने के लिए सज़ा दी जा रही है , जिसके लिए कसूर भी आदिवासी, मूलनिवासी ,किसान ,गरीब या जंगल के बाशिंदों का बताया जा रहा है , और सब मौन हैं , हम अभी नहीं समझे तो फिर समझने लायक कुछ बचेगा भी नहीं ।
 उपस्थित ग्रामीणों  में राजनाथ तिग्गा, बरातू तिर्की,जयाराम मिंज,निर्मल एक्का , बोधनराम पैकरा, रोनहा मिंज, जगलाल मिंज , डी आर पैकरा , सगराम तिर्की, आनंद मझवार , दिनेश कुजूर , बब्लू दास , प्रभात खलखो , बाबूलाल किंडो,रत्तू एक्का , मनबहाल मिंज , दधेश्वर एक्का , ठुठुआ तिर्की, सोमार साय , पी आर तिर्की , मनोज खेस , बनस राम आदि उपस्थित थे ।