PWD की बेशर्मी : रात के सन्नाटे में गड्ढों का 'मेकअप' बरसते पानी में 'वाटरप्रूफ' डामर का छिड़काव,‘मेकअप’ ऐसा कि बारिश भी शरमा जाए
Subhas Gupta
Wed, Oct 28, 2026
PWD की बेशर्मी
‘मेकअप’ ऐसा कि बारिश भी शरमा जाए: रात के अंधेरे में टपकते बादलों तले PWD का 'वाटरप्रूफ' चमत्कार, गड्ढों पर डामर का काजल लगाकर खपाया बजट!
सूरजपुर। नासा और इसरो के वैज्ञानिकों को अपनी रिसर्च तुरंत रोककर सूरजपुर के लोक निर्माण विभाग (PWD) से विशेष ट्रेनिंग लेनी चाहिए। विभाग के कर्मठ सूरमाओं ने सिविल इंजीनियरिंग के तमाम कायदे-कानूनों की ऐसी 'श्रद्धांजलि' दी है कि इतिहास हमेशा याद रखेगा। शहर की बदहाल सड़कों पर थूक-पॉलिश करने की ऐसी तलब उठी कि न गिरता पानी दिखा, न रात का घना अंधियारा—छाता तानकर, टॉर्च जलाकर गड्ढों पर डामर का ऐसा 'फेसपैक' पोता गया कि देखने वाले अपनी ही आंखों पर माथा पीट लें।
इंजीनियरिंग का आठवां अजूबा: पानी में घुलती गिट्टी, बहता डामर
आमतौर पर इंसान बारिश में पकोड़े और चाय तलाशता है, मगर सूरजपुर PWD के जांबाज 'बजट हजम' करने की भूख मिटाने के लिए जलमग्न सड़कों पर निकल पड़े। रिंग रोड पर पानी छलक रहा था और हमारे कर्मवीर उस पर डामर की पतली चादर बिछा रहे थे। यह पैचवर्क था या सड़क का अंतिम संस्कार, समझ से परे है। किसी तकनीकी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं, एक दूध पीता बच्चा भी बता देगा कि पानी और गर्म डामर की दुश्मनी जन्म-जन्मांतर की है। मगर हुक्मरानों को सड़क टिकाने से मतलब किसे है? मकसद तो बस बिल पास कराना, कागजों का पेट भरना और बजट को 'ठिकाने' लगाना है।
चमकदार 'गुलाबी दावे' और जनता के टूटते मणके
रिंग रोड की छाती पर दिन-रात भारी पहिए नाचते हैं और विभाग ने इलाज के नाम पर गिट्टी-डामर का ऐसा छिड़काव किया है, जैसे शादी के मंडप में गुलाब जल छिड़का जा रहा हो। यह तथाकथित पैचवर्क किसी भारी ट्रक के चंद फेरे तो दूर, कल सुबह सूरज की पहली किरण भी ढंग से झेल ले तो गनीमत समझिए। भारी वाहन निकलेंगे तो डामर की पपड़ी यूं उधड़ेगी जैसे किसी सस्ते सैलून का फेशियल पहली ही फुहार में बह जाता है। फिर वही गड्ढे, वही कमरतोड़ झटके, वही रीढ़ की हड्डियों का इम्तिहान और एलाइनमेंट खोती गाड़ियां।
कमीशन का खेल अव्वल, गड्ढों पर लिपापोती का जश्न
जनता अपनी गाढ़ी कमाई का टैक्स भरकर रोज़ अस्पताल और गैरेज के चक्कर काटे, मगर साहब और ठेकेदार की जुगलबंदी पर कोई आंच न आए। हर साल करोड़ों का फंड उड़नछू हो जाता है और सड़कें चंद महीनों में छलनी होकर 'चांद की जमीन' बन जाती हैं। गड्ढों को पाटने का यह ढोंग न हादसे रोकेगा, न जनता का दर्द कम करेगा।
साफ दिख रहा है कि यह थूक-पॉलिश सिर्फ फाइलों में 'सुगम आवागमन' का गुलाबी ढिंढोरा पीटने के लिए है। बहरहाल, जनता दुआ करे कि सूरज देवता मेहरबान रहें, क्योंकि विभाग का यह करिश्माई ‘काजल’ अगली बौछार में बहकर खुद अपनी और अपने आकाओं की पोल इसी सड़क पर खोल देगा।
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