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'रामभरोसे' स्वास्थ्य सेवा : इलाज चाहिए? तो पहले 'भगवान' से मिलिए, क्योंकि अस्पताल तो ताले में कैद है!

Pappu Jayswal

Fri, Jul 10, 2026

बिहारपुर चांदनी। सूरजपुर जिले के दूरस्थ और पहाड़ी आदिवासी अंचल महुली में स्वास्थ्य विभाग ने इलाज का एक नया और 'क्रांतिकारी' मॉडल ईजाद किया है यहाँ सरकारी उप स्वास्थ्य केंद्र पर ताला लटकना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस 'सोच' का प्रमाण है, जो मानती है कि आदिवासियों को स्वास्थ्य सुविधा नहीं, सिर्फ सरकारी वादों की पुड़िया चाहिए।

महुली का 'अदृश्य' अस्पताल और नर्स की 'राजसी' लंच-ब्रेक

​कल्पना कीजिए, एक घायल बच्चा 20 किलोमीटर का दुर्गम सफर तय करके पहुंचता है, यह सोचकर कि अस्पताल में मरहम मिलेगा। लेकिन उसे मिलता है लोहे का जकड़ा हुआ ताला और नर्स की गैर-मौजूदगी। गजब का प्रशासनिक बचाव देखिए—प्रभारी महोदय कहते हैं, "नर्स खाना खाने गई थी।" वाह! मतलब, राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं अब मरीजों की जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि नर्सों की 'लंच-टाइमिंग' के हिसाब से चलती हैं। क्या उस बच्चे का दर्द नर्स की थाली से भी छोटा था? या स्वास्थ्य विभाग का यह नया नियम है कि 'इमरजेंसी' भी लंच-ब्रेक के बाद ही आएगी?

'बाइक एंबुलेंस' कागजों में 'जीवनरक्षक',

कभी इस इलाके में 'बाइक एंबुलेंस' की फोटो खिंचवाकर खूब वाहवाही लूटी गई थी! आज वो एंबुलेंस कहां है? अधिकारियों की नजर में वो 'सफल मॉडल नहीं थी', इसलिए उसके पुर्जे निकलकर वाहन का सामान्य उपयोग किया जा रहा। यह सिर्फ संसाधनों की बर्बादी नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के साथ किया गया एक भद्दा मजाक है।

निजी अस्पतालों का 'दलाल' बन बैठा सरकारी तंत्र

​महुली का उप स्वास्थ्य केंद्र अब इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों का 'प्रचार केंद्र' बन चुका है। नर्स खुद पर्चा नहीं लिखती, बस एक ही मंत्र फूँकती है— "बाहर जाओ, निजी अस्पताल जाओ, या बिहारपुर जाओ।" यह कैसी स्वास्थ्य सेवा है, जो अपने मरीजों को देखते ही 'भागने' का रास्ता दिखाती है? जब वहां न डॉक्टर है, न दवा, तो किस आधार पर इसे 'स्वास्थ्य केंद्र' कहा जा रहा है? इसे 'तालाबंदी केंद्र' कहना ज्यादा उचित होगा।

प्रशासन की चुप्पी: क्या किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है?

​आदिवासी अंचल में स्वास्थ्य व्यवस्था की यह बर्बादी किसी अनजाने में हुई गलती नहीं, बल्कि एक सोची-समझी 'सक्रिय लापरवाही' है। अधिकारियों के वातानुकूलित कमरों तक शायद महुली सहित आसपास के आदिवासी, पण्डो जनजातीय के मरीजों की चीखें नहीं पहुंचतीं। अगर वहां डॉक्टर नहीं बिठा सकते, दवाएं नहीं दे सकते तो उस सरकारी इमारत पर 'स्वास्थ्य केंद्र' का बोर्ड क्यों लटका रखा है? उसे उतारकर किसी 'सरकारी दुकान' का बोर्ड लगा दीजिए, ताकि कम से कम लोग इलाज की उम्मीद में 20 किलोमीटर का सफर बर्बाद न करें! बहरहाल प्रशासन 'फाइलों' की नींद में है। यदि अधिकारियों की कलम में अब भी स्याही बची है, तो इस केंद्र को खोलिए और उन जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कीजिए जिन्होंने एक पूरे अंचल को 'इलाज के अभाव' में मरने के लिए छोड़ दिया है।

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