तेंदुआ की हलचल : किया बैल का शिकार, ग्रामीणों में दहशत
Sun, Apr 12, 2026
चांदनी बिहारपुर. जिले के वनांचल क्षेत्र चांदनी बिहारपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत महूली हड़दोआ पारा में बीती रात एक खौफनाक घटना सामने आई, जहां जंगली तेंदुए ने एक बैल को अपना शिकार बना लिया। इस घटना के बाद पूरे गांव में भय माहौल व्याप्त है। मिली जानकारी के अनुसार, मवेशी मालिक रविंद्र जायसवाल का बैल रोज की तरह रात में महुआ खाने के लिए गांव के पास स्थित पेड़ के नीचे गया हुआ था। इसी दौरान रोहिना पहाड़ की दिशा से आए तेंदुए ने अचानक हमला कर बैल को दबोच लिया और कुछ ही पलों में उसे मौत के घाट उतार दिया। सुबह जब ग्रामीण घटनास्थल पर पहुंचे तो बैल मृत अवस्था में पड़ा मिला, जिसके शरीर पर गहरे घाव और घसीटने के निशान पाए गए। घटना के बाद ग्रामीणों में भारी दहशत फैल गई है। ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में अब शाम ढलते ही लोग घरों में कैद हो जा रहे हैं। कई ग्रामीणों ने अपने मवेशियों को खुले में छोड़ना बंद कर दिया है और रात के समय सामूहिक रूप से पहरा देना शुरू कर दिया है।
वन विभाग की पुष्टि, मुआवजा प्रक्रिया शुरू
घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग बिहारपुर की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू की।वन विभाग बिहारपुर के रेंजर मेवा लाल पटेल ने बताया कि प्रथम दृष्टया जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि बैल की मौत जंगली जानवर तेंदुआ के हमले से हुई है। उन्होंने कहा कि प्रभावित मवेशी मालिक को शासन के प्रावधानों के तहत क्षतिपूर्ति (मुआवजा) प्रदान किया जाएगा।साथ ही, विभाग द्वारा पंचनामा तैयार कर आगे की कार्रवाई की जा रही है और क्षेत्र में तेंदुए की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के लगातार सिमटने, भोजन की कमी और मानवीय हस्तक्षेप के कारण जंगली जानवर अब रिहायशी क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
ग्रामीणों की मांगें
तेंदुए को पकड़ने के लिए तत्काल पिंजरा लगाया जाए,प्रभावित मवेशी मालिक को शीघ्र मुआवजा दिया जाए,गांव में नियमित गश्त और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई जाए,वन विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जाए।
जीवन का सहारा : कुदरत का खजाना समेटने जंगलों में आदिवासी, महुआ बना जीवन का सहारा
Sun, Apr 12, 2026
चांदनी बिहारपुर. जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र चांदनी बिहारपुर में इन दिनों जंगलों में कुदरत का खजाना बरस रहा है। जहां एक ओर भीषण गर्मी लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है, वहीं यहां के आदिवासी परिवारों के लिए यही मौसम खुशियों और रोजगार का समय लेकर आता है।मार्च से मई तक का समय यहां के ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। फरवरी के अंतिम सप्ताह से ही महुआ के पेड़ों में फूल और फल आना शुरू हो जाते हैं, जिसके बाद जंगलों में महुआ बीनने का सिलसिला तेज हो जाता है।सुबह तड़के ही महिलाएं, पुरुष और बच्चे टोकनियां व बर्तन लेकर जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। सुबह 5 बजे से लेकर दोपहर तक महुआ बीनने का काम चलता है, वहीं कई जगहों पर शाम को भी ग्रामीण इस कार्य में जुटे रहते हैं।स्थानीय ग्रामों जैसे महूली, नवाटोला और आसपास के वन क्षेत्रों में महुआ के पेड़ों से फूलों की झड़ी लगी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि इन दिनों पेड़ों से महुआ पानी की तरह गिर रहा है, जिसे इकट्ठा करने में पूरा परिवार जुटा रहता है।ग्रामीणों के अनुसार महुआ उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं है। करीब 2 से 3 महीनों तक उन्हें इससे रोजगार मिल जाता है। महुआ के फूलों को सुखाकर बाजार में बेचने से अच्छी आमदनी हो जाती है, जिससे सालभर की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है।महुआ के फूल के बाद इसके फल, जिन्हें स्थानीय भाषा में (डोरी एवं “गुली)” कहा जाता है, भी आय का एक बड़ा स्रोत बनते हैं। इन फलों को तोड़कर भी ग्रामीण अतिरिक्त कमाई कर लेते हैं।महुआ बीनने वाले एक ग्रामीण ने बताया कि, “इस समय पेड़ों पर फूलों की भरमार है। सुबह के समय सबसे ज्यादा महुआ गिरता है। हम इसे इकट्ठा कर सुखाते हैं और बाजार में बेचकर अच्छी आय प्राप्त करते हैं।”कुल मिलाकर, चांदनी बिहारपुर क्षेत्र में महुआ का पेड़ आदिवासी जीवन का आधार बना हुआ है। चिलचिलाती धूप के बीच भी लोग पूरे उत्साह के साथ जंगलों में जुटे हैं, क्योंकि यही मेहनत उनके परिवार की आजीविका का मुख्य सहारा है।
ओलावृष्टि : महुआ बर्बाद, वनांचल में रहने वाले परिवारों पर संकट..
Wed, Apr 8, 2026
सूरजपुर के वनांचल में 10 हजार परिवारों पर संकट, 25 करोड़ से ज्यादा का नुकसान
चांदनी-बिहारपुर. जिले के दूरस्थ वनांचल क्षेत्र चांदनी-बिहारपुर में इस वर्ष बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने आदिवासी जीवन की सबसे बड़ी आर्थिक धुरी ‘महुआ’ को तबाह कर दिया। ‘पीला सोना’ कहे जाने वाले महुआ की करीब 80 प्रतिशत फसल नष्ट हो गई है, जिससे क्षेत्र के 10 हजार से अधिक परिवार सीधे प्रभावित हुए हैं। यह क्षेत्र ऐसा है जहां 30 से अधिक गांवों के ग्रामीण रबी फसल की खेती नहीं करते, बल्कि पूरे सीजन जंगलों में महुआ संग्रहण कर अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन इस बार प्रकृति की मार ने उनकी सालभर की कमाई छीन ली।
25 करोड़ का सीधा नुकसान, रोजी-रोटी पर संकट
एक अनुमान के मुताबिक, इस बार ओलावृष्टि के कारण क्षेत्र में करीब 25 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।पिछले वर्षों में एक परिवार औसतन 10 क्विंटल महुआ एकत्र कर 45 से 50 हजार रुपये तक कमा लेता था, लेकिन इस बार उत्पादन 80% तक घट गया है।बीते वर्ष इसी क्षेत्र से करीब 32 करोड़ रुपये का महुआ व्यापार हुआ था। सरगुजा संभाग में सामान्य वर्षों में महुआ का कारोबार 200 करोड़ रुपये तक पहुंचता है, लेकिन इस बार उत्पादन गिरने से व्यापार भी ठप पड़ गया है।
सरकारी दाम कम, बाजार में ज्यादा कीमत
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा महुआ का समर्थन मूल्य 30 रुपये प्रति किलो तय किया गया है, जबकि बाजार में यह 45 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।इसी वजह से ग्रामीण सरकारी खरीदी केंद्रों से दूरी बना रहे हैं।
महुआ पर टिका है पूरा इलाका
ओड़गी ब्लॉक के चांदनी-बिहारपुर क्षेत्र की 35 से अधिक ग्राम पंचायतों के लोग पूरी तरह महुआ पर निर्भर हैं। यह इलाका गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के घने जंगलों से घिरा हुआ है, जहां से बड़े पैमाने पर महुआ संग्रहण होता है।
मध्यप्रदेश के आदिवासी भी पहुंचते हैं जंगलों में
महुआ सीजन में मध्यप्रदेश के सीमावर्ती 8 से अधिक गांवों के आदिवासी भी इस क्षेत्र में संग्रहण के लिए पहुंचते हैं। इससे जंगलों में दोनों राज्यों के लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है।
महुआ खरीदी में भारी गिरावट
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, पहले जहां एक व्यापारी 50 से 100 बोरा महुआ खरीदता था, वहीं इस बार यह घटकर सिर्फ 5 से 10 बोरा रह गया है। बिहारपुर के रेंजर मेवालाल पटेल ने बताया कि बाजार दर और समर्थन मूल्य में अंतर के कारण ग्रामीण महिला स्व-सहायता समूहों को महुआ नहीं बेचते। इस संबंध में 4 वर्ष पूर्व ही शासन को रिपोर्ट भेजकर मूल्य बढ़ाने की मांग की गई थी। बड़े व्यापारियों ने पिछले वर्षों में महुआ को कोल्ड स्टोरेज में रखकर ऊंचे दाम का इंतजार किया, लेकिन इस बार कीमत नहीं बढ़ने से पुराना स्टॉक भी अटका हुआ है।