राजस्व का केंद्र या नशे का अड्डा? : स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत, उप-पंजीयक कार्यालय में 'शौचालय नहीं, शराब की बोतलें'
Rajesh Soni
Thu, Jul 16, 2026
सूरजपुर। जहाँ एक ओर सरकार शासन-प्रशासन के डिजिटलीकरण और जनता को बेहतर सुविधाएँ देने का दम भरती है, वहीं सूरजपुर का उप-पंजीयक कार्यालय सरकारी दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। यह कार्यालय, जो प्रतिवर्ष शासन के खजाने में लाखों-करोड़ों का राजस्व जमा करता है, आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
'रजिस्ट्री' दफ्तर में 'जाम' का जश्न
कार्यालय के ठीक पीछे का नजारा किसी 'मधुशाला' से कम नहीं है। भारी मात्रा में बिखरी देसी-विदेशी शराब की बोतलें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि शाम ढलते ही यह सरकारी परिसर असामाजिक तत्वों के लिए निजी 'पार्टी स्पॉट' बन जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशासनिक नाक के ठीक नीचे चल रहे इस 'नशे के कारोबार' से जिम्मेदार अनजान हैं या 'धृतराष्ट्र' की भूमिका में सुख की नींद सो रहे हैं?
स्वच्छ भारत का 'कांच' से स्वागत
विकास और स्वच्छता के सरकारी नारों के बीच, यहाँ आने वाले ग्रामीणों के लिए बुनियादी शौचालय तक उपलब्ध नहीं है। मीलों दूर से रजिस्ट्री कराने आने वाले बुजुर्गों और महिलाओं को लाचारी में कार्यालय के पीछे की झाड़ियों का रुख करना पड़ता है। विडंबना देखिए, नशेड़ियों द्वारा वहीं फोड़ी गई शराब की बोतलों के नुकीले कांच अब ग्रामीणों के पैरों के लिए काल बनकर बिछे हुए हैं।
इस मौसम में झाड़ियों और कीचड़ के बीच छिपे ये कांच के टुकड़े किसी गंभीर हादसे को न्योता दे रहे हैं। क्या प्रशासन किसी बड़े घाव या संक्रमण के बाद ही नींद से जागेगा?
प्रशासनिक कुंभकर्ण की प्रतीक्षा
शहर के बीचों-बीच स्थित इस कार्यालय परिसर में उगी लंबी झाड़ियाँ और पसरा कचरा स्पष्ट करता है कि यहाँ के जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर अपनी कुर्सियां तो गर्म कर रहे हैं, लेकिन उन्हें परिसर की सुरक्षा और जन-सुविधाओं से कोई सरोकार नहीं है।
क्या जिला प्रशासन और पंजीयन विभाग के अधिकारी किसी बड़े हादसे के घटित होने की प्रतीक्षा में हैं?
क्या सरकारी परिसर में 'ओपन बार' चलाने वाले असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई करने का साहस किसी में बचा है?
क्या आम जनता को अपनी गाढ़ी कमाई के बदले कम से कम एक शौचालय की सुविधा मिल पाएगी?
सूरजपुर का यह कार्यालय अब केवल दस्तावेजों की रजिस्ट्री नहीं कर रहा, बल्कि अपनी अव्यवस्था से प्रशासनिक उदासीनता की भी एक ऐसी 'रजिस्ट्री' कर रहा है, जो आने वाले समय में जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
क्या अब कुंभकर्णी नींद में सोया विभाग जागेगा, या जनता को इसी तरह कांच के टुकड़ों और बदबू के बीच अपना काम चलाना होगा?
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