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कागजों पर तैरते पुल: उफनती बरगा नदी में बाइक कंधे पर उठाकर 'जल सत्याग्रह' को मजबूर जनता

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बाहुबली' बने ग्रामीण : कागजों पर तैरते पुल: उफनती बरगा नदी में बाइक कंधे पर उठाकर 'जल सत्याग्रह' को मजबूर जनता

Rajesh Soni

Thu, Sep 3, 2026

सूरजपुर। डिजिटल इंडिया और विकास के गगनचुंबी दावों के बीच सूरजपुर जिले के चांदनी-बिहारपुर अंचल से एक ऐसा "रोमांचक" दृश्य सामने आया है, जिसे देखकर हॉलीवुड के स्टंट डायरेक्टर भी पानी मांग जाएं। पिछले एक सप्ताह से जारी बारिश ने जब बरगा नदी को उफान पर ला दिया, तो रसौकी क्षेत्र के ग्रामीणों को प्रशासनिक लापरवाही ने मजबूरन 'बाहुबली' बना दिया। वायरल वीडियो में एक युवक अपनी दोपहिया गाड़ी को चलाने के बजाय उसे कंधे पर लादकर नदी के तेज बहाव में तैरता-डूबता पार करता नजर आ रहा है।

​अमूमन गाड़ियां इंसान का बोझ ढोती हैं, मगर सूरजपुर के इस दुर्गम इलाके में सिस्टम का बोझ इंसान और उसकी बाइक दोनों मिलकर उठा रहे हैं।

कागजों पर सरपट दौड़ते पुल, जमीन पर सिर्फ घुटने भर पानी

​पहाड़ी ढलानों से आते सैलाब के बीच जरा सा पैर फिसलना सीधे जल समाधि का न्योता है, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह रोज का 'एडवेंचर स्पोर्ट्स' बन चुका है। दशकों से पुल-पुलियों की फाइलें सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में बिना भीगे सुरक्षित तैर रही हैं, जबकि जमीन पर जनता को अपनी जान हथेली पर (और बाइक कंधे पर) रखकर दरिया पार करना पड़ता है। हर मानसून में यह नदी सिर्फ पानी लेकर नहीं आती, बल्कि सड़क और पुल के तमाम चुनावी वादों को भी बहा ले जाती है।

'जलमार्ग' पर अटकीं एंबुलेंस, शिक्षा और स्वास्थ्य भी बने जलमग्न

स्वास्थ्य सेवाएं लाचार: उफनती नदी के इस पार से उस पार तक एंबुलेंस के सायरन की आवाज तो पहुंच जाती है, लेकिन गाड़ी नहीं। गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को चारपाई पर लादकर ले जाना यहां का स्थायी 'हेल्थ प्रोटोकॉल' बन चुका है।

बच्चों का 'अग्निपरीक्षा' जैसा सफर: स्कूली बच्चों के लिए स्कूल जाना पढ़ाई से ज्यादा 'जल परीक्षा' पास करने जैसा है। सुरक्षित रपटे के अभाव में बस्ते सिर पर और भविष्य अधर में लटका रहता है।

संपर्क विहीन गांव: दर्जनों गांवों का मुख्य मार्गों से संपर्क कटना अब कोई खबर नहीं, बल्कि प्रशासनिक कैलेंडर का एक तयशुदा वार्षिक कार्यक्रम बन चुका है।

जांच कमेटी और बड़े हादसे का इंतजार

​स्थानीय ग्रामीणों ने एक बार फिर रस्म अदायगी करते हुए प्रशासन से सुरक्षा दल तैनात करने और पक्का पुल बनाने की गुहार लगाई है। हालांकि, परिपाटी यही रही है कि जब तक कोई बड़ी अनहोनी न घट जाए, तब तक सरकारी तंत्र 'स्थिति पर नजर बनाए रखने' का औपचारिक चश्मा नहीं उतारता।

​कंधे पर बाइक ढोते इस युवक का वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है और साथ ही तैर रहे हैं वे बुनियादी सवाल—कि आखिर कब तक जनता अपने टैक्स के बदले सिर्फ जान जोखिम में डालने का अधिकार पाती रहेगी? देखना यह है कि फाइलों में पुल बनाने वाले इंजीनियर और अफसर इस वीडियो को देखकर जागते हैं या फिर अगले साल की बारिश का इंतजार करते हैं।

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