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शिक्षा विभाग का कीर्तिमान, अब स्कूल की छत से बरसेगा 'ज्ञान' का पानी

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खास रिपोर्ट : शिक्षा विभाग का कीर्तिमान, अब स्कूल की छत से बरसेगा 'ज्ञान' का पानी

Rajesh Soni

Sat, Aug 29, 2026

सूरजपुर।​अगर आप वातानुकूलित कमरों में बैठकर 'पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया' के नारों पर ताली बजा-बजाकर थक चुके हैं, तो थोड़ा कष्ट कीजिए और सूरजपुर जिले के दूरस्थ अंचल चांदनी बिहारपुर पधारिए। यहाँ ग्राम पंचायत खोहीर के आश्रित ग्राम बैजनपाठ स्थित माध्यमिक शाला में शिक्षा विभाग एक ऐसा 'क्रांतिकारी' प्रयोग कर रहा है, जिसे देखकर बड़े-बड़े इंजीनियर भी अपना सिर पीट लेंगे।

​यहाँ कागजों पर शिक्षा व्यवस्था नहीं संवर रही, बल्कि साक्षात् 'इंद्रदेव' बच्चों की परीक्षा ले रहें है।

भ्रष्टाचार की छत, लाचारी का फर्श

​मामला बड़ा दिलचस्प है। स्कूल के पास अपना कोई वजूद (भवन) नहीं है। साल २०२२-२३ में सरकारी खजाने से 'लाखों' रुपये (शायद दीमकों और ठेकेदारों के पेट) में तब्दील कर एक 'अतिरिक्त कक्ष' खड़ा किया गया। सोचा गया था कि बच्चे इसमें पढ़ेंगे, लेकिन ठेकेदार ने शायद इसे 'स्विमिंग पूल' कम 'क्लासरूम' ज्यादा समझकर बनाया। नतीजा? पहली ही तेज बारिश में छत ने 'भ्रष्टाचार के रिसाव' की ऐसी गवाही दी कि कमरा आधा तालाब बन गया।

​अब स्थिति यह है कि ५० बच्चे और शिक्षक इस उलझन में हैं कि कमरे में 'मछली पालन' का कोर्स शुरू करें या पढ़ाई जारी रखें?

'ओपन एयर क्लासरूम' का अनूठा मॉडल

​प्रधान पाठक सुंदरमन सिंह का दर्द जायज़ है। वे पूछते हैं, "बच्चों को बैठाएं या पानी से बचाएं?" लेकिन शिक्षा विभाग के आला अफसर शायद इसे सकारात्मक नजरिए से देख रहे होंगे। छत टपक रही है, तो क्या हुआ? बच्चों को 'प्रकृति की गोद में' (यानी खुले आसमान के नीचे) बैठने का 'अनिवार्य पाठ' जो मिल रहा है। इसे ही तो कहते हैं - आपदा को अवसर में बदलना!

​भीगने से बचने के लिए बच्चे बाहर बैठते हैं। शायद विभाग चाहता है कि बच्चे धूप और बारिश सहकर 'कड़क' बनें, आखिर देश का भविष्य जो ठहरे!

साहब! कमीशन का हिसाब बाद में, जरा मरम्मत तो करा दीजिये

​स्थानीय ग्रामीण राधेश्याम साकेत का गुस्सा सातवें आसमान पर है। वे पूछते हैं कि क्या दूरस्थ अंचल के बच्चों को सुरक्षित छत का अधिकार नहीं है? ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि महज़ दो साल में यह 'अतिरिक्त कक्ष' खंडहर कैसे बन गया? इसकी तकनीकी जांच कब होगी और कमीशनखोरी की मलाई खाने वालों पर डंडा कब चलेगा?

​ग्रामीणों ने सूरजपुर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से गुहार लगाई है कि कृपया अपने 'ठंडे दफ्तरों' से बाहर निकलकर इस 'रिसती हुई हकीकत' का दीदार करें। इस 'जलप्रपात' नुमा कमरे की मरम्मत हो और इन बच्चों के लिए एक अदद, सुरक्षित और स्थायी भवन नसीब हो, ताकि वे 'भीगकर' नहीं, बल्कि 'सीखकर' आगे बढ़ें।

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