काफिला निकला, फोटो खिंची, आश्वासन बंटा : सूरजपुर में साहबों का 'निरीक्षण मेला' संपन्न, जमीनी हकीकत जस की तस!
Rajesh Soni
Sat, Oct 31, 2026
साहब चले पेरिस बनाने, सूरजपुर रह गया झाड़-झंखाड़ में: वादों की चाशनी में घुला 'वीआईपी वीकेंड टूर'!
सूरजपुर। आज शनिवार की सुबह जिले के आला हुक्मरान 'सूरजपुर टूरिज्म' का आनंद लेने निकले। गाड़ियों के चमचमाते काफिले और हूटर की गूंज के साथ साहबों की फौज ऐसे उतरी, मानो आज शाम ढलते-ढलते सूरजपुर का कायाकल्प स्विट्जरलैंड की तर्ज पर हो ही जाएगा।
सबसे पहले कलेक्टर मैडम रेना जमील और डीएफओ साहब विपुल अग्रवाल ने शिव वन वाटिका में कदम रखे। जो पार्क पिछले कई सालों से आवारा मवेशियों की शरणस्थली और सूखी झाड़ियों का जंगल बना हुआ है, वहां अधिकारियों की कल्पनाशीलता की पतंग ऐसी उड़ी कि सीधे बादलों में जा फंसी। अफसरों ने खड़े-खड़े हवा में ही ‘ट्री-हाउस’ की छत डाल दी और बिना एक ईंट हिले बच्चों के लिए प्ले-एरिया भी ‘विकसित’ कर डाला! स्व-सहायता समूह से कैंटीन चलवाने का खाका ऐसे खींचा गया मानो अगले सोमवार से वाटिका में फाइव-स्टार मेन्यू तैयार मिलने वाला हो। साथ खड़े मातहत नोटपैड पर पेन ऐसे रगड़ रहे थे, जैसे सूरजपुर का मास्टरप्लान आज ही खत्म करना हो।
इसके बाद यह काफिला कन्या महाविद्यालय के खेल मैदान पर 'लैंड' हुआ। वहां धूल-मिट्टी से सनी महिला खिलाड़ियों ने जब पूछ लिया कि "साहब, ग्राउंड में वॉशरूम और चेंजिंग रूम कब बनेगा?", तो अफसरों ने बिना एक पल गंवाए सरकारी तिजोरी का सबसे बासी हथियार बाहर निकाला—'हरसंभव सहयोग का भरोसा'! खिलाड़ियों को इतना भारी-भरकम आश्वासन थमाया गया कि बेचारी खिलाड़ी भी सोच में पड़ गईं कि पहले यह आश्वासन संभालें या अपनी खेल किट! "प्रयास किया जाएगा" का ऐसा लॉलीपॉप दिया गया, जिसे चूसते-चूसते शायद खिलाड़ियों की अगली पीढ़ी भी मैदान में उतर जाए।
गढ़कलेवा में नाश्ते के स्वाद और कृष्ण कुंज की उजड़ी हरियाली पर 'समीक्षा' का लेप लगाने के बाद साहब लोग पहुंचे दुलही तालाब। तालाब के चारों तरफ तैरता प्लास्टिक, सड़ती गंदगी और सीना ताने खड़े पक्के अतिक्रमण को देखकर अफसरों ने भौंहें ऐसे सिकोड़ीं, मानो यह सारा कब्जा कल रात मंगल ग्रह से आए एलियंस ने किया हो! वहां भी वही घिसा-पिटा टेप बजाया गया—"अतिक्रमण तुरंत हटाएं और सफाई सुनिश्चित करें।" वही निर्देश, जो पिछले दस साल से तालाब की हर काई वाली ईंट को जबानी याद हो चुके हैं।
पीछे-पीछे चल रहे जिला पंचायत सीईओ, अपर कलेक्टर और पालिका उपाध्यक्ष की टोली गॉगल्स चढ़ाए चेहरों पर इतनी गहरी 'गंभीरता' का मुखौटा लगाए घूम रही थी, मानो शहर के सारे गड्ढे वे अपनी नजरों से ही भर देंगे।
मैदान जस का तस रहेगा, तालाब में मच्छर वही रहेंगे और वाटिका में बबूल ही उगेंगे, लेकिन साहबों की डायरी में आज का 'सूरजपुर उद्धार' पूरी तरह दर्ज हो चुका है—कम से कम कैमरों के लिए तो शहर आज पेरिस बन ही गया!
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