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विकास' की रफ्तार : 15 लाख का रपटा 'जलविहार' पर निकला, 15 दिन भी नहीं टिक सका !

Rajesh Soni

Sun, Jul 19, 2026

सूरजपुर। निर्माण क्षेत्र में चमत्कार और भ्रष्टाचार का अद्भुत संगम देखना हो, तो सूरजपुर के बासा पारा का रुख करें। यहाँ लोक निर्माण सेतु विभाग की कार्यकुशलता का एक ऐसा नमूना पेश किया गया है, जिसे देखकर प्रकृति भी अपनी हंसी नहीं रोक पा रही है। 15 लाख की लागत से बनाया गया रपटा महज 15 दिन में ही अपना अस्तित्व खोकर मानसून की पहली फुहारों के साथ बह निकला। ​NH-43 से सटे डुमरिया-केवरा मार्ग पर ग्राम पंचायत बासापारा के पास गोबरी नदी पर बने इस रपटे को देखकर स्थानीय लोगों को विभाग की 'दूरदर्शिता' पर तरस आ रहा है। विभाग ने शायद यह मान लिया था कि रपटा 'पानी से बचने' के लिए नहीं, बल्कि 'पानी के साथ बहने' के लिए बनाया गया है।2005 में बना पुल इस कारनामे के पीछे की कहानी और भी दिलचस्प है। याद दिला दें कि 2005 में इसी गोबरी नदी पर करोड़ों की लागत से बना पुल पिछली बरसात में बह गया था। विभाग ने उस 'गौरवशाली इतिहास' को दोहराते हुए, इस बार 15 लाख का छोटा रपटा भेंट किया, जो 15 दिन की उम्र भी पूरी नहीं कर सका। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस रपटे की उम्र तय करने के लिए कोई 'रबर स्केल' का इस्तेमाल किया गया था, जो पहली बारिश में ही खिंच कर टूट गया?  क्या यह रपटा किसी का 'कागज का जहाज' था जो पहली नदी मिलते ही जलमग्न हो गया? 15 लाख के इस नन्हे-मुन्ने रपटे का बलिदान क्या किसी बड़े भ्रष्टाचार की स्क्रिप्ट का हिस्सा है? फिलहाल ग्रामीणों के लिए सड़क संपर्क फिर से अतीत की बात हो गई है। लोक निर्माण सेतु विभाग की इस 'अस्थाई निर्माण कला' ने यह साबित कर दिया है कि उनके बनाए पुल और रपटे केवल 'मौसम के अनुकूल' होते हैं—यानी, जैसे ही मौसम बदला, निर्माण गायब!

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