बिहारपुर में 12 हाथियों का तांडव : पकने की कगार पर खड़ी धान की फसल रौंदी, कागजी मुआवजे के भरोसे बेबस किसान
Subhas Gupta
Sun, Oct 11, 2026
कोरिया और प्रतापपुर से पहुंचे दो दलों ने महूली में मचाया उत्पात; महावीर खेरवार समेत आधा दर्जन किसानों की गाढ़ी कमाई मिट्टी में मिली
सूरजपुर। सूरजपुर जिले का वनांचल चांदनी बिहारपुर एक बार फिर जंगली हाथियों की दहशत और प्रशासनिक बेबसी का गवाह बन रहा है। पिछले तीन दिनों से इलाके में डेरा जमाए 12 हाथियों के दल ने शनिवार की रात ग्राम महूली और आसपास के खेतों में जमकर तांडव मचाया। जब महीनों के पसीने के बाद फसल कटाई की दहलीज़ पर खड़ी थी, तभी हाथियों ने खेतों को रौंदकर किसानों के मुंह का निवाला छीन लिया। महूली निवासी किसान महावीर खेरवार समेत आधा दर्जन से अधिक अन्नदाताओं की लहलहाती धान की फसल देखते ही देखते जमींदोज हो गई। वन विभाग का वही घिसा-पिटा 'नियमानुसार क्षतिपूर्ति' का आश्वासन सामने आया है, जो बर्बाद हो चुके किसानों के दर्द पर महज एक औपचारिक मरहम से ज्यादा कुछ नहीं दिखता।
दो अलग-अलग दिशाओं से आकर एक हुए झुंड, दहशत में दर्जनभर गांव
बिहारपुर परिक्षेत्र के रेंजर मेवालाल पटेल के अनुसार, छह हाथी कोरिया जिले की सीमा से और छह अन्य प्रतापपुर-रमकोला क्षेत्र से दाखिल हुए हैं। दोनों दलों के एकजुट होने से अब 12 हाथियों का यह विशाल कुनबा क्षेत्र में बेकाबू होकर विचरण कर रहा है। इसके अलावा एक दंतैल हाथी महीनों से झुंड से अलग होकर आसपास ही मंडरा रहा है, जिससे खतरा दोगुना हो गया है।
वर्तमान में यह झुंड परसा, महूली और रोहीना पहाड़ के जंगलों में डेरा डाले हुए है। शाम ढलते ही हाथियों के महूली, जुड़वनिया, कछवारी, करौटी, चोंगा, रामगढ़ और कोल्हुआ की रिहायशी बस्तियों में घुसने की प्रबल आशंका है, जिसने ग्रामीणों की रातों की नींद उड़ा दी है।
सालाना तबाही की मार: पकती बालियों पर चले पैर, कागजी प्रक्रियाओं में उलझा मुआवजा
यह तबाही कोई पहली बार नहीं आई है। हर साल ठीक उस वक्त जब धान की बालियां पककर तैयार होती हैं, हाथियों का झुंड ग्रामीणों की सालभर की आजीविका को लील जाता है। प्रभावित किसान महावीर खेरवार की शिकायत पर विभाग ने नुकसान का संज्ञान तो लिया है, लेकिन सर्वे, आकलन और फाइलों के चक्कर में मुआवजा कब और कितना मिलेगा—यह सवाल किसानों के सीने में चुभ रहा है।
विभाग की केवल 'सतर्कता' की अपील
वन विभाग ने ग्रामीणों को जंगल में न जाने, हाथियों को भगाने के लिए करीब न जाने और तत्काल सूचना देने की नसीहतें जारी की हैं। मगर सवाल उठता है कि जब हाथियों का कॉरिडोर और आगमन का समय सालों से तय है, तब जंगलों से सटे इन लाचार किसानों की सुरक्षा और फसलों के बचाव के लिए सिर्फ 'सतर्कता' की अपीलें ही विभाग का अंतिम हथियार क्यों साबित होती हैं?
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