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संतुष्टि का धन, कवित्री डॉ. पूनम माटिया

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बाल कहानी : संतुष्टि का धन, कवित्री डॉ. पूनम माटिया

Rameshvar Vaishnaw

Sat, Sep 12, 2026

बाल कहानी:

लेखिका कवित्री डॉ. पूनम माटिया

यश अपने दादू का कुर्ता खींच-खींच कर कह रहा था, "दादू कहानी सुनाओ न ! अब तो मेरी गर्मी की छुट्टियाँ भी शुरू हो गई हैं।"

दादा जी ने पलंग पर लेटते हुए कहा, "अरे बेटे ! छुट्टियाँ हैं तो जल्दी सो जाओ, सुबह मेरे संग सैर के लिए चलना।"

यश कहाँ मानने वाला था, उसके पास न प्रश्नों की कमी थी, न दादू से कहानी सुनने के कारणों की। वह झट से बोला, "नहीं दादू, आज तो आपसे कहानी सुनकर ही सोऊँगा। न पापा कहानी सुनाते हैं, न ही मम्मी के पास समय होता है। बस जॉब से आकर काम में व्यस्त हो जाती हैं और फिर कहती हैं, 'मैं थक गई, अब सोऊँगी'।"

अब दादा जी बेचारे क्या करते, उन्होंने यश की ज़िद के आगे झट से घुटने टेक दिए और उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए कहने लगे, "नंदन वन में एक वृक्ष था—दुबला-पतला सा, लेकिन बेहद सुंदर। सुंदर और सुडौल होने के बावजूद भी उसे एक बड़े से घने दरख्त से ईर्ष्या होती थी।"

यश बोला, "दादू, दरख़्त क्या होता है?"

"बेटे, दरख़्त यानी पेड़। वह पतला वृक्ष सोचता था कि काश मैं भी वैसा ही हो जाऊँ। उसकी 'विश' पता नहीं कैसे पूरी हो गई, शायद कोई एंजेल या परी उसकी बात छिपकर सुन रही थी। रात ही रात में वह हरे-हरे कोमल पत्तों से भर गया। वह खुशी से झूमने लगा। उसे देख अनेक पशु-पक्षी उसके पास आए, किन्तु यह क्या ! जानवर अपनी भूख मिटाने के चक्कर में उसके सारे पत्ते खा गए।"

"फिर क्या हुआ दादू?" यश की आँखों से नींद बिल्कुल गायब थी।

दादा जी अपनी लय में आगे सुनाते गए, "वृक्ष उदास हो गया और सोचने लगा, 'इससे तो अच्छा होता कि मेरे पत्ते पतले और नुकीले हो जाते'। उसकी यह इच्छा भी पूरी हुई। जब वह सोकर सुबह उठा तो देखा कि वैसा ही हुआ है जैसा उसने चाहा था। कांटेदार और नुकीले पत्ते गाँव वाले अपने घरों की बाड़ बनाने के लिए काट कर ले गए।"

"अब वृक्ष के मन में ख़याल आया, 'काश ! मेरे पत्ते सोने के हो जाएँ और मैं सबसे खूबसूरत लगूँ'। देखते ही देखते वह सोने से लद गया, परन्तु उसकी खुशी उसी पल जाती रही जब उसने देखा कि गरीब-अमीर सभी उसके पत्ते तोड़कर ले जा रहे हैं। और ले जाते भी क्यों न, आखिर सोना पेड़ पर किस काम का !"

यश की आँखों में नींद के कोई आसार नहीं थे और दादा जी भी उसकी उत्सुकता को और बढ़ा रहे थे।

"पेड़ ने सोचा, 'सोने का होने से तो अच्छा है कि मैं बर्फ़ का बन जाऊँ'। यह सोचते-सोचते वह सो गया। तड़के उठकर क्या देखता है कि उसकी सभी पत्तियाँ दूध जैसी सफेद बर्फ़ की बन गई थीं। पर अभी वह ठीक से भगवान को धन्यवाद कह भी नहीं पाया था कि सूर्य की तेज किरणें उसे चुभने लगीं।"

"फिर क्या हुआ दादा जी?" यश उठकर बैठ गया।

दादा जी उदास होकर बोले, "होना क्या था बेटे, सभी पत्तियाँ एक-एक करके पिघलने लगीं। वृक्ष फिर वही का वही खाली, बेबस और उजाड़ हो गया। वह सोचने लगा कि इससे तो बेहतर था कि वह जैसा था, वैसा ही रहता।"

यश बोला, "हाँ दादू, पेड़ तो पहले ही सुंदर था, पर उसकी इच्छाएँ ही खत्म नहीं हो रही थीं।"

दादा जी बोले, "हाँ मेरे समझदार बच्चे ! देर से ही सही, पेड़ ने संतुष्टि का धन पा ही लिया।"

शिक्षा: मनुष्य की तो जन्म से लेकर मरने तक पिपासा यानी प्यास यानी इच्छाएँ शांत ही नहीं होतीं ! अनंत, अविरल, सदैव उसका ध्यान अधिक से अधिक पाने में लगा रहता है, आखिर मानुष जो ठहरा; किन्तु उसे प्रकृति से सीखना चाहिए।

कवित्री डॉ. पूनम माटिया

दिल्ली

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