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सड़क का गड्ढा न होता, तो 'नशे का अड्डा' आबाद रहता: 1.19 करोड़ का गांजा पकड़ाया

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अनियंत्रित ट्रक! : सड़क का गड्ढा न होता, तो 'नशे का अड्डा' आबाद रहता: 1.19 करोड़ का गांजा पकड़ाया

Subhas Gupta

Thu, Oct 1, 2026

​प्लास्टिक दाने का बहाना, भीतर था नशीला खजाना; मोड़ पर ट्रक क्या पलटा, पुलिस का मुखबिर खुद 'हादसा' बन गया

​सूरजपुर। कहते हैं कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, मगर कभी-कभी उन हाथों को सही पते तक पहुंचाने के लिए एक अदद सड़क हादसे की दरकार होती है। सूरजपुर के घाटपेण्डारी घाट पर अगर 12 चक्का ट्रक का संतुलन न बिगड़ा होता, तो शायद 'सिस्टम' का संतुलन कभी न बिगड़ता। ओड़िशा से लखनऊ जा रहा ₹1.19 करोड़ मूल्य का 238 किलो गांजा पुलिसिया मुस्तैदी से नहीं, बल्कि गुरुत्वाकर्षण और तीखे मोड़ की बदौलत 'जब्त' हो गया।

​सवाल सीधा है—अगर ट्रक घाट में न पलटता, तो क्या खाकी की तीसरी आंख कभी प्लास्टिक के दानों में छिपी इस 'हरी दौलत' को सूंघ पाती?

​तिरपाल का पहरा और गड्ढे का रहस्य

घटना 30 सितंबर की है। यूपी नंबर (UP 13 T 5497) का भारी-भरकम ट्रक घाट पर पलट गया। दुर्घटना के बाद आमतौर पर लोग जान बचाते हैं, लेकिन यहां चालक दल अपनी 'जान' यानी बोरियों को बचाने में जुट गया। बिखरे माल में से प्लास्टिक दाने की फिक्र छोड़, 9 खास बोरियों को सड़क से दूर एक गड्ढे में बड़े सलीके से छुपाया गया। ऊपर से तिरपाल तान दी गई और पहरा ऐसा कि कोई परिंदा भी पर न मार सके।

​गांव वालों को दाल में कुछ काला लगा—या यूं कहें कि पूरे गड्ढे में ही 'काला-सफेद' कारोबार दिखा। खबर चंदौरा थाने पहुंची। पुलिस मौके पर पहुंची, तिरपाल उठी और प्लास्टिक दाने की आड़ में रखा 238 किलो 290 ग्राम गांजा रोशनी में आ गया। साथ में 12 लाख का क्षतिग्रस्त ट्रक और 19 बोरी प्लास्टिक दाना भी कानूनी शिकंजे में बंध गया।

​ओड़िशा का माल, लखनऊ का ख्वाब, सूरजपुर में 'मोक्ष'

पुलिस ने मौके से अलीगढ़ निवासी सुनील कुमार (32 वर्ष) को धर दबोचा है। पूछताछ में जो कहानी निकली, वह अंतरराज्यीय सिंडिकेट की पोल खोलने के लिए काफी है। माल ओड़िशा से चला था, गंतव्य था नवाबों का शहर लखनऊ। बीच के सैकड़ों किलोमीटर और दर्जनों चेकपोस्ट पार होते रहे, मगर किस्मत का कांटा सूरजपुर के घाट पर ही अटकना था। आरोपी अब एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(बी) के मेहमान हैं और पुलिस बाकी 'साझेदारों' की कुंडली खंगाल रही है।

​जांच का आईना: मुखबिर फेल, मोड़ पास!

इस पूरे ड्रामे का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि करोड़ों की यह बरामदगी किसी हाई-टेक सर्विलांस, गोपनीय इनपुट या बॉर्डर नाकेबंदी का नतीजा नहीं थी। यह पूरी तरह से ट्रक के स्टेयरिंग की 'लापरवाही' का फल था।

​सड़क का एक गड्ढा वह काम कर गया जो कई थानों की चेकिंग नहीं कर पाई। अब चंदौरा पुलिस की पीठ थपथपाई जा रही है—थाना प्रभारी लक्ष्मण सिंह धुर्वे और उनकी टीम बधाई की पात्र जरूर है कि सूचना मिलते ही खेल बिगाड़ दिया। लेकिन पीछे छूट गया वही कड़वा सवाल: जो ट्रक नहीं पलटते, वे कहां पहुंचते हैं?

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