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अस्पताल के ताले नहीं खुले, पर नवजात की सांसें बंद हो गईं, सिस्टम की चौखट पर उजड़ी मां की गोद

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सरकारी दावों का जनाजा : अस्पताल के ताले नहीं खुले, पर नवजात की सांसें बंद हो गईं, सिस्टम की चौखट पर उजड़ी मां की गोद

Subhas Gupta

Thu, Oct 15, 2026

सूरजपुर। सरकारी विज्ञापनों में चमकता स्वास्थ्य ढांचा ज़मीन पर कितना खोखला और संवेदनहीन है, इसकी जीती-जागती और रूह कंपा देने वाली तस्वीर रामानुजनगर ब्लॉक के गणेशपुर (श्रीनगर) प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में देखने को मिली। जहाँ ज़िंदगी बचाने का दावा करने वाला अस्पताल ही एक नवजात की कब्रगाह बन गया। अंदर ‘सफेदपोश मुलाज़िम’ अपनी चैन की नींद में थे या ड्यूटी से नदारद, और बाहर चौखट पर एक गर्भवती महिला का दर्द सिस्टम के बहरे कानों पर सिर पटकता रहा।

​चीखें गूंजती रहीं, पर पत्थर बने रहे अस्पताल के कपाट

घटना बीती रात करीब 11 बजे की है। गणेशपुर निवासी अनिल कुमार सारथी अपनी पत्नी को असहनीय प्रसव पीड़ा के बीच उम्मीद का दामन थामे स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे थे। उन्हें गुमान था कि अस्पताल खुला होगा और उनके बच्चे को ज़िंदगी मिलेगी। लेकिन अस्पताल का मुख्य गेट अंदर से कसकर बंद था। परिजन रोते-बिलखते रहे, सांकल खटखटाते रहे, रात के सन्नाटे में अस्पताल के नाम पर बनी उस इमारत से रहम की भीख मांगते रहे—मगर किसी ‘धरती के भगवान’ का दिल नहीं पसीजा।

​ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर और स्टाफ का कहीं कोई अता-पता नहीं था; वे या तो गहरी नींद में थे या अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रखकर गायब।

​खुले आसमान के नीचे डिलीवरी, सिस्टम की लापरवाही से नवजात ने तोड़ा दम

घंटों चली जद्दोजहद और दर-दर भटकने की बेबसी के बीच महिला की पीड़ा असहनीय हो गई। नतीजतन, अस्पताल के बंद ताले के सामने, खुले परिसर की मिट्टी पर ही उस मां को प्रसव के लिए मजबूर होना पड़ा। बिना किसी चिकित्सकीय मदद, बिना किसी दवा और बुनियादी सुविधा के, उस नवजात ने सिस्टम की इस नग्न क्रूरता के बीच आंखें खोलीं—और चंद सांसें लेकर उसी ठंडी जमीन पर हमेशा के लिए खामोश हो गया।

​अत्यधिक रक्तस्राव की वजह से मां वहीं अचेत होकर गिर पड़ी। आनन-फानन में बेबस परिजन उसे लेकर रामानुजनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भागे, जहाँ वह अब भी ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही है।

​कागज़ी फाइलों में दम तोड़ती जवाबदेही, ग्रामीणों में फूटा आक्रोश

एक बेबस मां की गोद उजड़ जाने के बाद इलाके में भारी जनाक्रोश भड़क उठा है। ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अस्पताल का घेराव कर सिस्टम की इस संवेदनहीनता के खिलाफ आवाज़ बुलंद की है। जनता सीधे सवाल दाग रही है—लाखों की तनख्वाह लेने वाले ये मुलाज़िम आखिर किसके दम पर जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं?

​क्या यह महज़ एक ‘लापरवाही’ है या सिस्टम द्वारा किया गया एक ठंडा कत्ल? अब देखना यह है कि प्रशासन हमेशा की तरह जांच समिति बनाकर मामले को कागज़ों में दफन करता है, या फिर उस मां की उजड़ी गोद के गुनहगारों पर ऐसी कार्रवाई होगी जो नजीर बने।

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