मंत्री जी की गाड़ी मुड़ी नहीं कि 'सुरक्षा' भी साथ ले उड़े : सूरजपुर में 24 घंटे का 'फोटो-सूट' बना क्यूआर कोड अभियान!
Rajesh Soni
Wed, Oct 14, 2026
साधुराम सेवा कुंज से मैराथन खत्म, प्रचार सामग्री भी फुर्र; जनता पूछ रही— क्या सिर्फ साहबों की आंखों को भाने के लिए सजे थे चौराहे?
सूरजपुर। सरकारी आयोजनों में अगर 'तस्वीर' और 'तकदीर' का फर्क समझना हो, तो सूरजपुर जिला प्रशासन की ताज़ा कलाकारी सबसे उम्दा मिसाल है। यहां सड़क सुरक्षा का मतलब आम राहगीर की हिफाजत नहीं, बल्कि वीआईपी की गाड़ियों के काफिले तक सीमित नजर आया। साधुराम सेवा कुंज में दो-दो कैबिनेट मंत्रियों की मौजूदगी में जिस 'अपना हेल्प क्यूआर' तकनीक को दुर्घटना पीड़ितों के लिए 'संजीवनी' बताकर ढोल पीटे गए थे, मंत्रियों के जिले की सीमा पार करते ही उस 'संजीवनी' का तंबू-कनात 24 घंटे के भीतर उखाड़ फेंका गया।
'हरि झंडी' हिली, ताली बजी और काम खत्म!
छत्तीसगढ़ शासन की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और लोक स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने मंच से सुशासन और तकनीकी क्रांति के कसीदे पढ़े। दावा हुआ— "सुरक्षा आपकी, जिम्मेदारी हमारी।" करीब 800 प्रतिभागियों ने 5 किलोमीटर पसीना बहाया, ताकि जनता को भरोसा हो कि अब दुर्घटना होने पर एक क्यूआर कोड उनकी जान बचा लेगा। मगर हकीकत यह निकली कि सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उस वक्त तक थी, जब तक मंच पर माइक ऑन था और कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे।
'इमरजेंसी स्कैन' से पहले ही सिस्टम हो गया 'आउट ऑफ रीच'
दावा था कि क्यूआर कोड स्कैन होते ही एंबुलेंस दौड़ेगी, परिजनों को तत्काल व्हाट्सएप अलर्ट जाएगा और नो-पार्किंग की समस्या सुलझेगी। लेकिन साहब, कोड स्कैन करने के लिए बोर्ड का चौराहे पर होना भी तो जरूरी है! जिस जनता को यह तकनीक रटाई जानी थी, उसके देखने से पहले ही चौक-चौराहों और बाजारों के खंभों पर लगे मजबूत लोहे के फ्रेम वाले फ्लेक्स-बैनर रातों-रात उतार लिए गए। शायद तंत्र को लगा कि अगर जनता ने सचमुच कोड स्कैन कर मदद मांग ली, तो आपातकालीन अमले को काम करना पड़ जाएगा!
जनता पूछ रही— क्या हम सिर्फ बैकग्राउंड आर्टिस्ट थे?
रोड से,बाजारों से अचानक नदारद हुए पोस्टरों को देखकर अब राहगीर चुटकी ले रहे हैं। आमजन का सीधा सवाल है— क्या यह हाईटेक 'क्यूआर कोड' सिर्फ मंत्रियों की नजरों को सुहाने के लिए लगाया गया था? जब तकनीक जनता के लिए थी, तो मंत्रियों के रवाना होते ही उसे समेटने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी?
जनता के टैक्स के पैसे से लगे बोर्ड अगर 24 घंटे भी सड़क पर न टिक सकें, तो इसे जागरूकता अभियान कहें या प्रशासनिक नौटंकी? बहरहाल, सूरजपुर के चौराहों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि व्यवस्था के लिए 'सड़क सुरक्षा' सिर्फ एक दिन का इवेंट मैनेजमेंट है, जो वीआईपी की रवानगी के साथ ही इतिहास बन जाता है।
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