सूरजपुर में ‘पर्यावरण संरक्षण’ का अनोखा मॉडल : ग्रामीण पकड़ते हैं लकड़ी तस्कर, वन विभाग बाइज्जत देता है ‘ग्रीन कॉरिडोर’
Subhas Gupta
Mon, Oct 12, 2026
गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान और बिहारपुर परिक्षेत्र में जंगल साफ, तस्करों की तिजोरी फुल, विभाग की आंखें ‘सरकारी मोड’ में बंद
रिटायरमेंट से ठीक पहले साहब का ‘विशेष ऑफर’: पेड़ तुम काटो, कार्रवाई का ड्रामा हम करेंगे!
सूरजपुर। अगर आपको लगता है कि जंगलों की रक्षा करना वन विभाग का काम है, तो बिहारपुर वन परिक्षेत्र और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान की सीमा पर आकर अपनी गलतफहमी दूर कर लीजिए। यहां का सिस्टम बेहद स्पष्ट है—जंगल तस्कर काटेंगे, पकड़ने की जहमत ग्रामीण उठाएंगे, और वन विभाग पकड़े गए तस्करों को चाय-पानी पूछकर मुस्कुराते हुए रवाना कर देगा।
ताजा किस्सा महुली चौक का है। जागरूक ग्रामीणों ने अपने स्तर पर वन विभाग की ‘नाकामी’ की भरपाई करते हुए छिन्न की बेशकीमती लकड़ियों से लदी एक पिकअप को धर दबोचा। जनता को लगा कि दफ्तर ले जाएंगे तो कानून अपना काम करेगा। लेकिन वन दफ्तर पहुंचते ही कानून ने शायद आंखें मूंद लीं और कुछ ही घंटों में लकड़ी लदी गाड़ी ‘सरकारी आशीर्वाद’ के साथ हवा हो गई। बिना जब्ती, बिना एफआईआर, मामला रफा-दफा!
चर्चा तो यह भी है कि प्रतापपुर से आने वाले तस्कर इतने ‘शिष्ट और संस्कारी’ हैं कि पेड़ काटने से पहले दफ्तर में बकायदा हाजिरी लगाते हैं। खैर और छिन्न के पेड़ रातों-रात गायब हो रहे हैं, और लकड़ी के लट्ठों के बीच वन्यजीवों की खालों का धंधा भी बदस्तूर जारी होने की सुगबुगाहट है। मगर विभाग को क्या? ‘गांधी जी के नोटों’ की चमक के आगे जंगल का हरा रंग वैसे भी फीका पड़ जाता है।
जंगल कटने की इस हड़बड़ी की एक दिलचस्प वजह भी इलाके में तैर रही है—साहब का रिटायरमेंट। इसी महीने रेंजर साहब को विदाई मिलनी है, और विदाई से पहले ‘भविष्य निधि’ का कोटा पूरा करने की ऐसी फुर्ती शायद ही किसी सरकारी दफ्तर में देखने को मिले। जब इस पूरे खेल पर बिहारपुर रेंजर मेवालाल पटेल से सवाल हुआ, तो उन्होंने वही चिर-परिचित रटा-रटाया बयान थमा दिया—"बीट गार्ड को कार्रवाई के लिए भेजा गया है।"
अब गार्ड साहब पिकअप पकड़ने गए थे या उसे सुरक्षित सीमा पार कराने, इसका जवाब तो सिर्फ वही जंगल दे सकता है, जिसके पेड़ अब केवल वन विभाग के रजिस्टरों में सुरक्षित बचे हैं।
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