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दीयों की चकाचौंध में गुम हुई गोबरी नदी की टूटी पुलिया: तेल के दाम से रसोई ठंडी, पर भाषणों से सूरजपुर हुआ ‘रोशन’!

ताली, थाली और अब दिया,‘दीया टास्क’,

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दिया तले अंधेरा : दीयों की चकाचौंध में गुम हुई गोबरी नदी की टूटी पुलिया: तेल के दाम से रसोई ठंडी, पर भाषणों से सूरजपुर हुआ ‘रोशन’!

Rajesh Soni

Fri, Sep 18, 2026

“रसोई में कड़वे तेल की बूंद-बूंद को तरसती है थाली,

मंच से ऐलान है कि चमक रही है हर डाली-डाली!

सड़क के गड्ढों में हिचकोले खा रहा है आज का सूरजपुर,

और हुक्मरान कह रहे हैं—2047 में आएगी असली दीवाली!”

​ देवलोक की बेबाक बाते

सूरजपुर। ​जिला मुख्यालय के रंगमंच पर अद्भुत आयोजन में पूरे 4 लाख 11 हजार 111 'आशीर्वाद के दीये' जलाए गए। इस शान से सुलगाए गए कि कुछ पलों के लिए महंगाई, बदहाली और टूटी सड़कों का सच दिये की रोशनी की कुछ पल में ओझल हो गया। शाम ढलते ही जैसे ही अद्भुत मंत्री महोदया के कर-कमलों से पहला दीपक जला, मंच के पीछे उड़ती गर्द-ओ-गुबार भी 'स्वर्णिम विकास' की भांति चमक उठी। मंच से 2047 के हसीन ख्वाबों की ऐसी चाशनी परोसी गई कि जनता अपनी वर्तमान हालात को भूलकर 21 साल आगे की तारीखों में टहलने लगी।

​इसी दौरान रंगमंच के एक कोने में अपनी दुखती कमर सहलाते हुए नीरज भाई ने गहरी सांस खींचकर कहा—

“ख्वाब इक्कीसवीं सदी के बाद के दिखाते हैं,

हम आज गोबरी नदी के नाले में गोते लगाते हैं!

2047 का विकसित भारत तो हम जन्नत से देख लेंगे हुजूर,

काश आज इस टूटी पुलिया की एक ईंट जुड़ जाती, तो हम शहर दूध बेचने पहुंच पाते!”

रोशनी का खेल: चिराग तले घोर अंधेरा

​विधायक जी ने बड़े फख्र से सीना तानकर फरमाया कि पूरा सूरजपुर दीयों से जगमगा रहा है। मगर अजब तमाशा यह रहा कि कार्यक्रम स्थल से चंद कदमों की दूरी पर उनकी अपनी ही पार्टी का दफ्तर घनघोर अंधेरे में सांसें गिन रहा था। जब कानाफूसी शुरू हुई और किरकिरी होने लगी, तो आनन-फानन में दो-चार दीये वहां भी टिकाए गए। उड़ते परिंदों ने गवाही दी कि ‘चिराग तले अंधेरा’ मुहावरे को झुठलाने के लिए फोटो सेशन का यह आपातकालीन ऑपरेशन बेहद कामयाब रहा। अंततः प्रशासन ने इस समूचे उपक्रम को 'उत्साहपूर्ण सहभागिता' घोषित कर सूरजपुर के इतिहास के किताब में अपने नाम 'गिनीज बुक' में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज कर लिया।

'आशीर्वाद' और 'सेवा रथ' का जमीनी पोस्टमार्टम:

  • रिंग रोड का पाताल-लोक टेस्ट: स्थानीय बाइक सवारों का कहना है कि इन लाखों दीयों को रंगमंच पर जाया करने के बजाय शहर के रिंग रोड पर रख देना चाहिए था। गड्ढे इतने गहरे और असीम हैं कि बिना दीये की रोशनी के सीधे पाताल लोक का टिकट कट जाता है। जहां दीया बुझ जाए, समझो वहीं किसी सड़क का मुकद्दर दफन है।

  • महंगाई का मर्मस्पर्शी स्पर्श: सरसों तेल की ऊंची उड़ान और घरेलू सिलेंडर के मिजाज देखकर गृहिणियों ने राहत जताई कि मिट्टी और रुई की बाती पर फिलहाल कोई नया सेस नहीं लगा है, वरना चूल्हे की जगह सिर्फ विकास के चुनावी पर्चे ही सेंकने पड़ते।

  • कागजी खाते और जनधन की यादें: मंच से वित्तीय क्रांतियों का ढोल पीटा गया, जिसे सुनकर भीड़ में खड़े एक बुजुर्ग ने अपनी खाली जेब में उंगली डालकर टटोला और तंज कसा—"खाता तो बैंक में शान से खुला है साहब, बस उसमें रखने के लिए चिल्लर की तलाश 2047 तक जारी रहेगी!"

  • जनभागीदारी का ‘धक्का मार’ मॉडल: 'सेवा संकल्प रथ' का इंजन गड्ढों में सांस फूलने से अगर कहीं बंद पड़ जाए, तो अफसरों का साफ फरमान है—जनता पीछे से कंधे लगाकर धक्का मारे, ताकि विकास की गाड़ी खिंचने का सीधा श्रेय 'जनभागीदारी' के खाते में चढ़ सके।

​ढोल-नगाड़ों और मांदर की गूंज इतनी जोरदार रखी गई थी कि उसके शोर में टूटे पुल, खंडहर आंगनबाड़ी केंद्र, जर्जर अस्पताल और त्रस्त जनता की कराहें मंच के VIP सोफों तक फटक भी न सकें। कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण वह था, जब अधिकारियों ने दीयों का तेल खत्म होने और बत्ती बुझने से पहले अपना ‘ऐतिहासिक फोटो’ खिंचवाकर आम जनता पर एहसान का एक और दीया रोशन कर दिया।

​अब समूचे सूरजपुर की नजरें सड़क पर टिकी हैं कि यह प्रचार रथ जनता के टोले-मोहल्ले तक पहुंच पाता है, या रास्ते के पहले ही ऑटो गैरेज में अपना ‘संकल्प’ विसर्जित कर देता है!

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