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निर्वाचित पत्नी बनीं मूकदर्शक, पति ने खा ली सरपंच पद की शपथ

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सरपंच-पति’ का कारनामा : निर्वाचित पत्नी बनीं मूकदर्शक, पति ने खा ली सरपंच पद की शपथ

Subhas Gupta

Wed, Oct 7, 2026

वोट मिला पत्नी को, कसम खा गए बिजली विभाग के बाबू: केवटाडीह में 'सरपंच-पति' का गजब कारनामा

​बिलासपुर (मस्तूरी)। लोकतंत्र में जनता जिसे चुनती है, शपथ भी उसी को लेनी होती है शायद यह नियम बिलासपुर के मस्तूरी विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत केवटाडीह (भूतहा) के लिए नहीं बना है। यहाँ महिला सशक्तिकरण का ऐसा अनूठा तमाशा देखने को मिला जहाँ जनता ने चुनी तो ‘महिला सरपंच’, लेकिन मंच पर सीना तानकर शपथ ‘सरकारी बाबू पतिदेव’ ने ले ली। पत्नी बगल में मूकदर्शक बनकर बैठी रहीं और बिजली विभाग में पदस्थ उनके पति महोदय ने संविधान, नियम-कायदे और पंचायती राज व्यवस्था को एक झटके में 'शॉर्ट सर्किट' कर दिया।

​पत्नी सिर्फ नाम की, सत्ता पति के काम की!

केवटाडीह ग्राम पंचायत कार्यालय के सामने आयोजित शपथ ग्रहण समारोह का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि नवनिर्वाचित महिला सरपंच श्रीमती जयंती जगत मंच पर शांत बैठी हैं, जबकि उनके पति अरुण जगत हाथ में पर्चा थामे बड़े रौब से पढ़ रहे हैं— "छत्तीसगढ़ ग्राम पंचायत निर्वाचन नियम के तहत... निष्ठा एवं ईमानदारी पूर्वक इस दायित्व का निर्वहन करूंगा..."। अब जनता यह सोचकर हैरान है कि वोट किसे दिया था और शपथ कौन खा रहा है?

​सरकारी नौकरी का वेतन, ऊपर से सरपंची का टशन!

हैरानी की पराकाष्ठा यह है कि शपथ की रस्म अदायगी करने वाले अरुण जगत कोई आम ग्रामीण नहीं, बल्कि बिजली विभाग के नियमित (रेगुलर) कर्मचारी हैं। यानी एक तरफ सरकार से हर महीने पक्की तनख्वाह और दूसरी तरफ खुलेआम पंचायती हुकूमत चलाने का बेखौफ शौक। सिविल सेवा आचरण नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ते शायद ही कहीं देखी गई हों।

​अंधा प्रशासन, गूंगे जिम्मेदार: किसके इशारे पर हुआ यह नाटक?

सवाल सिर्फ एक अति-उत्साही पति का नहीं, बल्कि मंच के सामने आंखें मूंदकर बैठे उन सरकारी नुमाइंदों का भी है जिनकी मौजूदगी में यह प्रहसन रचा गया। क्या जिम्मेदार अधिकारियों को यह फर्क भी समझ नहीं आता कि शपथ निर्वाचित जनप्रतिनिधि ले रहा है या उसका पति?

​महिलाओं को चूल्हे-चौके से निकालकर पंचायती राज में बराबर की हिस्सेदारी देने के लिए बने 50% महिला आरक्षण के कानून को यह घटना खुलेआम मुंह चिढ़ाती है। केवटाडीह में आरक्षण का मतलब सिर्फ पत्नी के नाम पर पर्चा भरना और कुर्सी पर पति का राज चलाना बनकर रह गया है। अब देखना यह है कि वायरल वीडियो पर कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन कोई कार्रवाई करता है या इसे भी ‘सरपंच-पति’ परंपरा का नया नियम मानकर रफा-दफा कर दिया जाएगा।

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