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जिंदा तो क्या, अब मुर्दों को भी नसीब नहीं सुकून, विधायक की सिफारिश पर मिलती है 'अंतिम यात्रा'!

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सूरजपुर में व्यवस्था का 'अंतिम संस्कार' : जिंदा तो क्या, अब मुर्दों को भी नसीब नहीं सुकून, विधायक की सिफारिश पर मिलती है 'अंतिम यात्रा'!

Rajesh Soni

Wed, Nov 4, 2026

सूरजपुर। जिले में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के हाल कुछ ऐसे हैं कि अब इंसानों को सिर्फ जीते जी ही नहीं, बल्कि मरने के बाद भी अपनी ही अर्थी और शव वाहन के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ रहा है। जिला अस्पताल में शव वाहनों की व्यवस्था पूरी तरह से दम तोड़ चुकी है। आलम यह है कि कुल 3 शव वाहनों में से 2 पहले ही हांफकर बैठ चुके हैं और बचा हुआ 1 इकलौता वाहन भी अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।

​जिंदा परेशान, मुर्दा हैरान: प्रसूता को नहीं मिला शव वाहन

​मामला रामानुजनगर ब्लॉक का है, जहां एक प्रसूता अस्पताल में प्रसव के लिए पहुंची थी, लेकिन उसने एक मृत नवजात को जन्म दिया। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब परिजनों ने अपने कलेजे के टुकड़े के शव को घर ले जाने के लिए वाहन की गुहार लगाई, तो जिम्मेदार अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

​परिजनों को घंटों अस्पताल परिसर में बेबस होकर भटकना पड़ा। आखिरकार, जब इसकी भनक प्रेमनगर विधायक को लगी, तब जाकर उनकी निजी पहल और दखलअंदाजी के बाद परिजनों को शव वाहन नसीब हुआ, तब कहीं जाकर वे अपने घर लौट सके।

बिना नंबर, बिना फिटनेस... भगवान भरोसे चल रहा 'कैम्प'

​जिले में शव वाहनों के संचालन की जिम्मेदारी 'कम्युनिटी एक्शन थ्रू मोटिवेशन प्रोग्राम' (कैम्प) के अधीन है। लेकिन इस व्यवस्था का सच कागजों से लेकर सड़कों तक तार-तार है:

  • ​वाहनों की स्थिति: 7 सितंबर 2018 को शुरू हुई इस व्यवस्था में आज भी वही 8 साल पुरानी जर्जर गाड़ियां दौड़ाई जा रही हैं।

  • ​कागजी वैधता शून्य: इन वाहनों का न तो कोई वैध रजिस्ट्रेशन नंबर है, न फिटनेस, और न ही कोई इंश्योरेंस या बीमा!

  • ​जिम्मेदारों की आंखें बंद: बीते 30 सितंबर से दो वाहन पूरी तरह बंद पड़े हैं, जिससे परिजनों की मुश्किलें आसमान छू रही हैं। हाल यह है कि बचा हुआ इकलौता वाहन भी ओडगी भेजा गया है, जिससे अस्पताल में कोहराम मचा है।

  • ​कटाक्ष: वाह रे सूरजपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था! जहाँ जिंदा इंसान इलाज के अभाव में सिसकता है, और मरने के बाद अभागे परिजनों को अपने प्रियजन के शव को घर ले जाने के लिए भी राजनीतिक सिफारिश की भीख मांगनी पड़ती है। कागजों पर दौड़ने वाली स्वास्थ्य सेवाएं शायद अब खुद भगवान भरोसे 'अंतिम सफर' तय कर रही हैं।

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