सूरजपुर में राज्योत्सव : टेंट भले न तने, पर बजना चाहिए मंत्री जी की रिश्तेदारी का डंका!'
Subhas Gupta
Sat, Oct 31, 2026
सूरजपुर। जिले में सरकारी जलसों की अपनी एक अलग ही नफासत है। यहां नियम-कायदों की फाइलें दफ्तरों में सुकून की नींद सोती हैं और काम 'आकाओं' के एक अदद इशारे पर मुकम्मल हो जाता है। आगामी 2 नवंबर को होने वाले राज्योत्सव की तैयारी भी इसी अदब के साथ शुरू हुई है। मैदान में अभी टेंट का खूंटा गड़ा नहीं, शामियाना तना नहीं, लेकिन साउंड बॉक्स रात के अंधेरे में सज-धज कर तैयार हो गए। गनीमत रही कि सुबह की पहली किरण पड़ते ही सारा तामझाम उतनी ही खामोशी से समेट भी लिया गया। लोग समझ ही नहीं पाए कि यह जनता के मनोरंजन की रिहर्सल थी या किसी 'खास' की धौंस आजमाने का ट्रायल!
कागजों पर कोई और, मैदान में 'माननीय' के रिश्तेदार
इस बेसुरी रागिनी की जड़ में टेंडर नहीं, बल्कि 'तेवर' हैं। एक तरफ बरसों से पसीना बहाने वाले साउंड कारोबारी हैं, तो दूसरी तरफ वो रसूखदार चेहरा जो सीना ठोककर खुद को सीधे माननीय मंत्री जी का करीबी बता रहा है। प्रशासन का हुनर देखिए—कागजों पर काम किसी और के नाम दर्ज है, लेकिन जमीन पर तार और माइक वही जोड़ रहे हैं जिनके सिर पर सियासी वरदहस्त है। सूरजपुर में यह कोई नई रवायत नहीं है; यहां प्रशासन किसी भी बड़े आयोजन के लिए गैजेट नहीं, अपनी सहूलियत की 'पॉकेट गाइड' खोलता है। टेंडर और प्रतिस्पर्धी दरों की पारदर्शी प्रक्रिया को किनारे रखकर मलाई बांटने का यह सलीका वाकई काबिले-तारीफ है।
कुदरगढ़ से लेकर राज्योत्सव तक: फोन की घंटी और 'जी हुजूरी' का खेल
बात सिर्फ 2 नवंबर के राज्योत्सव की नहीं है; बीते कुदरगढ़ महोत्सव हो, 15 अगस्त की परेड हो या 26 जनवरी की झांकी—हर बड़े आयोजन की पटकथा में नियमों से ज्यादा 'नेताओं की जी-हुजूरी' का रंग गाढ़ा रहता है। सत्ता के गलियारों से लेकर प्रशासनिक कुर्सियों तक जातिगत समीकरण और सियासी सिफारिशों का ऐसा कॉकटेल तैयार होता है कि जिले के आला हाकिमों के फोन घनघनाने लगते हैं। माननीय मंत्री जी से लेकर पार्टी के जिलाध्यक्ष तक के फोन जब दबाव भरे सुर में बजते हैं, तो नियम-पुस्तिकाएं खामोश हो जाती हैं।
हालात की नजाकत भांपते हुए कलेक्टर महोदया पूरे दलबल के साथ ग्राउंड में जायजा लेने तो जरूर पहुंचीं, लेकिन असली सवाल जस का तस हवा में तैर रहा है—क्या 2 नवंबर को मंच पर छत्तीसगढ़िया माटी और स्थानीय कलाकारों की कला का मान बढ़ेगा, या फिर पूरे जश्न में सिर्फ सियासी सिफारिशों और 'रिश्तेदारी' का ही बेसुरा साउंड ट्रैक गूंजता रहेगा?
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