जिंदगी पहिए के नीचे छिपी, मौत सड़क पर नाचती रही : सूरजपुर में हाथी के आगे फिर बेबस हुआ इंसान की चीखें
Subhas Gupta
Sun, Nov 1, 2026
सूरजपुर। जंगलों को कंक्रीट में तब्दील करने और कागजों पर ‘हाथी मित्र’ दल बनाने वाले वन महकमे की लापरवाही का एक और खूनी हिसाब सामने आ गया। सूरजपुर जिले के कल्याणपुर क्षेत्र में लंबे समय से बेखौफ घूम रहे 'कबरा कान' हाथी ने एक बार फिर खूनी खेल खेलते हुए एक बेगुनाह को मौत के घाट उतार दिया। बाइक पर सवार चाचा-भतीजे का कसूर सिर्फ इतना था कि वे अपने ही जिले की सड़क पर चल रहे थे, जहां जंगल का कानून और सरकारी लाचारी दोनों एक साथ भारी पड़ गए।
अखोरा रोड पर फुलझर नदी के पास मौत अचानक सामने आकर खड़ी हो गई। जब तक दोनों संभल पाते, विशालकाय जंगली हाथी ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। हाथी के बेरहम प्रहार से चाचा ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि कलेजे को कंपा देने वाले उस खौफ के बीच भतीजे ने पास खड़े एक ट्रक के नीचे रेंगकर अपनी सांसें बचाईं। सोचिए उस नौजवान की रूह किस कदर कांपी होगी, जो चंद फीट दूर अपने ही चाचा के चिथड़े उड़ते देख रहा था और खुद की जान बचाने के लिए एक लोहे के पहिए की ओट में दुबका हुआ था।
'कबरा कान' का पुराना हिसाब, पर विभाग का नया मौन
यह कोई पहला हादसा नहीं है। 'कबरा कान' हाथी इस पूरे वन परिक्षेत्र में इंसानी जान का सबसे बड़ा शिकारी बन चुका है। दर्जनों जिंदगियां लील लेने के बाद भी यह हाथी आज तक सिस्टम के लिए सिर्फ एक 'ट्रैकिंग का विषय' बना हुआ है। हर मौत के बाद कागजों पर अलर्ट जारी होते हैं, बैठकों में चाय की चुस्कियों के साथ बजट पास होते हैं, और जैसे ही कोई लाश उठती है, महकमे की गाड़ियां सायरन बजाते हुए महज रस्म अदायगी करने पहुंच जाती हैं।
आज भी वही हुआ—लाश बिछ गई, एक घर का चिराग बुझ गया, इलाके में दहशत का पहरा बैठ गया और वन विभाग की टीम हमेशा की तरह 'मौके पर पहुंच' गई। सवाल यह है कि जब हाथी का नाम, पता और उसकी हिंसक फितरत सबको मालूम है, तो फिर इंसानों को सड़कों पर यूं लावारिस मौत मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया है?
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